1. परिचय
- लेखक: मूसा (मृत्यु का वर्णन संभवतः यहोशू ने जोड़ा – 34 अध्याय)।
- नाम का अर्थ: “दूसरी व्यवस्था” (Deuteronomy = दूसरा विधान) → मूसा ने पुरानी पीढ़ी को व्यवस्था दोहराई और नई पीढ़ी को प्रतिज्ञा भूमि में प्रवेश की तैयारी कराई।
- समय और स्थान: लगभग 1400 ई.पू., मोआब की तराई में।
- मुख्य श्रोता: दूसरी पीढ़ी (जो जंगल में पैदा हुई थी, पहली पीढ़ी अविश्वास के कारण मर चुकी थी)।
- मुख्य विषय:
- परमेश्वर की व्यवस्था को स्मरण रखना।
- प्रेम और आज्ञाकारिता का महत्व।
- आशीष और शाप।
- प्रतिज्ञा भूमि में प्रवेश के लिए तैयार होना।
2. मुख्य विषय
- स्मरण – परमेश्वर के कार्य और आज्ञाओं को भूलना नहीं।
- प्रेम और आज्ञाकारिता – “तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन, प्राण और बल से प्रेम रखना।” (व्य. 6:5)
- आशीष और शाप – आज्ञाकारिता में आशीष, अवज्ञा में शाप (अध्याय 28)।
- नया नेतृत्व – यहोशू को मूसा का उत्तराधिकारी बनाया गया।
- प्रतिज्ञा भूमि का वादा – परमेश्वर की प्रतिज्ञा पूरी होने वाली थी।
3. संरचना (Outline)
🔹 भाग 1: मूसा का पहला भाषण – पिछली यात्रा की स्मृति (अध्याय 1–4)
- होरेब से कादेश और मोआब तक यात्रा का पुनरावलोकन।
- चेतावनी: मूर्तिपूजा से बचो और परमेश्वर की व्यवस्था को मानो।
📖 “तुम अपने नेत्रों से उन सब बातों को देखा है जो यहोवा ने की।” (व्य. 4:9)
🔹 भाग 2: दूसरा भाषण – व्यवस्था की व्याख्या (अध्याय 5–26)
- दस आज्ञाएँ दोहराई गईं (5)।
- महान आज्ञा: “यहोवा हमारा परमेश्वर, यहोवा एक ही है।” (6:4)
- मूर्तिपूजा और मिश्रण से सावधान।
- समाज और न्याय के नियम।
- उपासना, दशमांश और पर्व।
- विधवा, अनाथ और गरीबों की देखभाल (24:17-22)।
📖 “तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन, और सारे प्राण, और सारी शक्ति से प्रेम रखना।” (व्य. 6:5)
🔹 भाग 3: तीसरा भाषण – आशीष और शाप (अध्याय 27–30)
- गेरिज़ीम और एबाल पर्वत पर आशीष और शाप।
- अध्याय 28 → आज्ञाकारिता में आशीष, अवज्ञा में शाप (बहुत विस्तार से)।
- चुनाव: जीवन और मृत्यु, आशीष और शाप (30:19)।
📖 “मैं आज आकाश और पृथ्वी को तुम्हारे विरुद्ध साक्षी ठहराता हूँ कि मैंने जीवन और मृत्यु, आशीष और शाप तुम्हारे सामने रखा है; इसलिये जीवन को चुन।” (व्य. 30:19)
🔹 भाग 4: मूसा का अन्तिम भाषण और मृत्यु (अध्याय 31–34)
- यहोशू को उत्तराधिकारी ठहराया गया (31:7-8)।
- मूसा का गीत (32) और आशीष (33)।
- मूसा की मृत्यु (34) → वह प्रतिज्ञा भूमि को दूर से देख सका पर प्रवेश न कर सका।
📖 “मजबूत और साहसी हो; मत डर और तेरा मन कच्चा न हो, क्योंकि तेरा परमेश्वर यहोवा स्वयं तेरे संग चलता है।” (व्य. 31:6)
4. मुख्य बाइबल पद
- व्यवस्थाविवरण 6:4–5 – परमेश्वर से प्रेम करने की आज्ञा।
- व्यवस्थाविवरण 8:3 – “मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं जीवित रहता, परन्तु हर एक बात से जो यहोवा के मुख से निकलती है।” (यीशु ने इसे मत्ती 4:4 में उद्धृत किया)।
- व्यवस्थाविवरण 10:12 – परमेश्वर क्या चाहता है? – उसका भय मानना, उसकी आज्ञाओं का पालन करना।
- व्यवस्थाविवरण 30:19 – जीवन चुनने का आह्वान।
- व्यवस्थाविवरण 31:6 – “मजबूत और साहसी हो।”
5. आध्यात्मिक शिक्षा
- स्मरण का महत्व – परमेश्वर की भलाई और आज्ञाओं को भूलना न हो।
- प्रेम और आज्ञाकारिता – सच्चा विश्वास आज्ञाकारिता से प्रकट होता है।
- आशीष और शाप – परमेश्वर आज भी चाहता है कि हम जीवन और आशीष को चुनें।
- नेतृत्व का हस्तांतरण – मूसा से यहोशू → परमेश्वर का काम व्यक्ति पर नहीं रुकता।
- मसीह की ओर संकेत –
- मूसा जैसे भविष्यद्वक्ता का वादा (व्य. 18:15 → प्रेरितों के काम 3:22 में यीशु के बारे में)।
- यीशु ने जंगल में शैतान की परीक्षा में व्यवस्थाविवरण से ही उद्धरण दिया (मत्ती 4:1-11)।
6. आज के लिए अनुप्रयोग
- क्या मैं परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं और कामों को स्मरण करता हूँ?
- क्या मैं उसके वचन को अपने जीवन का नियम मानता हूँ?
- क्या मैं प्रेम और आज्ञाकारिता का चुनाव करता हूँ या स्वार्थ और अवज्ञा का?
- क्या मैं अपने परिवार और अगली पीढ़ी को परमेश्वर की आज्ञाएँ सिखा रहा हूँ (व्य. 6:7)?
