
जन्म :-1866 मृत्यू: 1915 मूल स्थान : इंडियाना, संयुक्त राज्य अमेरिका दर्शन : भारत
अदा बॉयड उन कई मिशनरियों में से एक थीं, जिन्होंने पर्दा प्रथा के तहत पीड़ित भारतीय महिलाओं की स्थितियों को सुधारने के लिए कड़ी मेहनत की। यह मुसलमानों और उच्च वर्ग हिंदुओं के बीच एक सामान्य प्रथा थी जिसके कारण महिलाओं को सार्वजनिक रूप से प्रकट होने और पुरुषों के साथ बातचीत करने पर रोक लगा दी गई थी। अदा बॉयड ऐसी महिलाओं से उनके घरों में मिलने जाती थी और उन्हें मसीह के प्रेम का अनुभव कराने में सफल रही।
अदा का जन्म इंडियाना में हुआ था और उनका पालन-पोषण उनकी दादी ने किया था। जब ‘क्रिस्चियन वूमन्स बोर्ड ऑफ़ मिशन्स’ (ईसाई महिला मिशन बोर्ड) ने महिला मिशनरियों को भारत भेजने की योजना बनाई, तो अदा ने उस सेवकाई के लिए अपने आप को पेश किया। मैरी ग्रेबील, मैरी किंग्सबरी और लौरा किन्से के साथ, अदा 1882 में भारत आई और फिर 1885 में बिलासपुर पहुंची। वह कर्तव्यनिष्ठ और एक उद्देश्यपूर्ण युवा महिला थी और मसीह का प्रचार करने जल्द से जल्द तैयार होने के लिए तुरंत हिंदी सीखना शुरू कर दिया। हालाँकि कई निराशाएँ और कठिनाइयाँ थीं, लेकिन अदा अपने मिशन में आगे बढ़कर, बिना किसी जाती भेदभाव का, सभी महिलाओं तक पहुँचना शुरू किया। उन्होंने पहले स्थानीय महिलाओं को बुनाई, सिलाई सिखाकर, और चिकित्सा देखभाल प्रदान करके उनसे दोस्ती की। फिर उन्होंने उन्हें बाइबल पढ़ना सिखाया क्योंकि उनका मानना था कि पढ़ने से उन्हें खुद सोचने में मदद मिलेगी। महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर इकट्टा होने की अनुमति नहीं होने के कारण वह उन्हें निर्देश देने के लिए गर्मी और गंदगी का परवाह नहीं करके जगह-जगह जाती थी ।
अदा एक दयालु महिला थी । 1899-1900 के भारतीय अकाल और महामारी के दौरान, उन्होंने कड़ी मेहनत करके गरीब बच्चों का पालन पोषण के लिए अपनी खुद की आय दी। उन्होंने एक अनाथालय भी बनाया और कई गरीब बेघर बच्चों को गोद लिया। उन्होंने उनके लिए स्कूल और संडे स्कूल भी शुरू किए। उनमें से कई बच्चों ने मसीह को स्वीकार किया और बाद में बपतिस्मा लिया।
अपने पूरे जीवन में, अदा परमेश्वर की एक समर्पित सेवक बने रहकर लगातार अपने मिशन सेवकाई में लगी रही। बिलासपुर में 33 वर्षों की सेवा के बाद, अदा 1915 में प्रभु के साथ रहने चली गई।