परिचय (Introduction)


• लेखक: मूसा (पेंटाट्यूक की पाँचों पुस्तकों का लेखक)।
• अर्थ: “आरंभ” (Beginning)।
• समय: लगभग 1445–1400 ई.पू.
• महत्व: बाइबल की पहली पुस्तक → सृष्टि, पाप, उद्धार, विश्वास और परमेश्वर की योजना की नींव।


मुख्य विषय
1. सृष्टि – परमेश्वर ने सब कुछ अच्छा बनाया। (उत्पत्ति 1–2)
2. पाप का प्रवेश – आदम और हव्वा का पतन। (अध्याय 3)
3. पाप के परिणाम – जलप्रलय, बाबेल का गुम्मट। (अध्याय 6–11)
4. परमेश्वर की उद्धार की योजना – अब्राहम से शुरू होकर चुने हुए वंश के द्वारा। (अध्याय 12–50)
5. विश्वास और आज्ञाकारिता – अब्राहम, इसहाक, याकूब, यूसुफ का जीवन।
________________________________________
3. संरचना (Outline)
भाग 1: प्रारंभिक इतिहास (अध्याय 1–11)


1. सृष्टि – परमेश्वर ने छह दिनों में संसार की रचना की। (1:1–2:25)
o “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।” (1:1)
2. पतन – आदम और हव्वा का पाप। (3:1-24)
o “सबने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।” (रोमियों 3:23, उत्पत्ति 3:6-7 संदर्भ)
3. कैइन और हाबिल – पहली हत्या। (4:1-16)
4. जलप्रलय – नूह और जहाज़। (6:9–9:29)
o “नूह ने परमेश्वर की दृष्टि में अनुग्रह पाया।” (6:8)
5. बाबेल का गुम्मट – मनुष्य का अभिमान और भाषा का बिखराव। (11:1-9)


भाग 2: पितृपुरुषों का इतिहास (अध्याय 12–50)
1. अब्राहम (12–25)
o बुलाहट: “मैं तुझे एक बड़ी जाति बनाऊँगा और तेरा नाम महान करूँगा।” (12:2)
o विश्वास की परीक्षा: इसहाक का बलिदान (22:1-19)।
2. इसहाक (25–26)
o अब्राहम का पुत्र, वाचा का उत्तराधिकारी।
3. याकूब (27–36)
o इस्राएल का नाम मिला (32:28)।
o 12 पुत्रों के द्वारा 12 गोत्रों की नींव।
4. यूसुफ (37–50)
o भाइयों का विश्वासघात, मिस्र में दासत्व।
o स्वप्नों की व्याख्या, प्रधान बनना।
o परिवार का मिस्र में बसना।
o “तुमने मेरे विरुद्ध बुराई का विचार किया था, परन्तु परमेश्वर ने उस से भलाई का विचार किया।” (50:20)
________________________________________


4. प्रमुख बाइबल पद
• सृष्टि: उत्पत्ति 1:1 – “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।”
• मनुष्य परमेश्वर की छवि में: उत्पत्ति 1:27 – “और परमेश्वर ने मनुष्य को अपनी ही छवि में उत्पन्न किया।”
• पतन: उत्पत्ति 3:15 – “और मैं तुझ में और स्त्री में बैर उत्पन्न करूँगा…” (यह पहला मसीहा सम्बन्धी वचन)।
• अब्राहम की बुलाहट: उत्पत्ति 12:2-3 – “तुझ से पृथ्वी के सब कुल आशीष पाएँगे।”
• यूसुफ का विश्वास: उत्पत्ति 50:20 – “परमेश्वर ने भलाई का विचार किया।”


5. आध्यात्मिक शिक्षा
1. परमेश्वर सृष्टिकर्ता है → जीवन का हर क्षेत्र उसी के अधीन है।
2. पाप का परिणाम मृत्यु है → हमें उद्धार की आवश्यकता है।
3. विश्वास के द्वारा धर्मी ठहरना → अब्राहम इसका उदाहरण है (15:6)।
4. परमेश्वर अपनी योजना पूरी करता है चाहे परिस्थितियाँ कठिन हों (यूसुफ का जीवन)।
5. मसीहा का वादा → आदम और हव्वा के पतन के समय से ही उद्धार की योजना।
________________________________________
6. आज के लिए अनुप्रयोग
• क्या मैं सृष्टिकर्ता परमेश्वर को अपने जीवन का केंद्र मानता हूँ?
• क्या मैं पाप को हल्के में लेता हूँ या उससे दूर भागता हूँ?
• क्या मेरा विश्वास अब्राहम जैसा है जो कठिन परिस्थितियों में भी भरोसा करता है?
• क्या मैं दूसरों के साथ क्षमा और भलाई करता हूँ जैसे यूसुफ ने किया?

Share.
Leave A Reply