मन फिराव (पश्चात्ताप)
मन फिराव पवित्र शास्त्र बाइबल का एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है, जिसका उल्लेख 100 से अधिक बार हुआ है।
1. मन फिराव की परिभाषाः
1. नकारात्मक – यह पाप के कारण मात्र दुःखी होना नहीं है। कई लोग पाप करने पर रोते हैं परन्तु तुरन्त उसकी ओर लौट जाते हैं। यहूदा इस्करियोति तथा एसाव ने पाप के लिए दुःख प्रकट किया (इब्रा १२:१७), परन्तु उन्होंने मन नहीं फिराया।
2. सकारात्मक यह मन का वह परिवर्तन है जो व्यवहार में परिवर्तन लाता
है (मत्ती २१:२८-३२)।
2. मन फिराव का महत्वः
1. यूहन्ना बपतिस्मादाता के संदेश का विषय ‘मन फिराव’ था (मत्ती ३:१-२)।
२. यीशु ने मन फिराव का प्रचार किया (मत्ती ४:१७)।
3. उसने अपने चेलों को आज्ञा दी कि मन फिराव का प्रचार करें (मरकुस 4.६:१२). पिन्तकस्त के बाद चेलों ने मन फिराव का प्रचार किया (प्रेरि २:३८ तथा २०:२१)।
5. परमेश्वर की इच्छा है कि सब मन फिराएँ (२) पत ३:९)।
6. परमेश्वर की आज्ञा न मानने का परिणाम अनन्त विनाश होगा (लूका १३:३)।
3. मन फिराव के परिणामः
1. सारा स्वर्ग आनन्दित होता है (लूका १५:७,१०)।
2. यह छुटकारा और पापों की क्षमा लाता है (यशा ५५:७; प्रेरि ३:१९)।
3. मन फिराने वाले पर पवित्र आत्मा उँड़ेला जाता है (प्रेरि २:३८)।
अभ्यास-कार्य – ऊपर दिए गए किसी एक सन्दर्भ को लेकर मन फिराव पर संदेश की रूपरेखा तैयार कीजिए।
विश्वास
विश्वास मसीही धर्म तथा व्यवहार का मूल सिद्धान्त है, क्योंकि विश्वास से हमारा उद्धार हुआ है (इफि २:८)। जब मसीह लोगों से बातचीत करता और उन्हें चंगा किया करता था, तो वह हर एक में विश्वास के विशेष गुणों को खोजता था। क्या आपको ये घटनाएँ याद हैं?
1. सूरूफिनीकी स्त्री का विश्वास आग्रहशील था (मरकुस ७:२६)।
2. सूबेदार ने नम्र विश्वास का प्रदर्शन किया था (मत्ती ८:८-१०)।
3. अन्धे व्यक्ति ने उत्साही विश्वास दिखाया (मरकुस १०:५१)।
1. विश्वास की परिभाषा
1. विश्वास अंगीकार, भरोसा, (तथ्य के प्रति) अटूट दृढ़ता और निष्ठा है (इन्ना 11:1)। जो विश्वास उद्धार दिलाता है वह प्रभु यीशु मसीह में व्यक्तिगत भरोसा रखना है।
२. उद्धार से संबंधित विश्वास के दो प्रकार हैं:
क. बौद्धिक विश्वास ऐतिहासिक मसीह की जानकारी तथा बाइबल को सामान्य रूप से स्वीकार करना।
ख. हृदय का विश्वास हृदय से किया गया विश्वास जो मनुष्य से उसके विश्वास के अनुसार कार्य करवाता है। मसीह में सच्चा विश्वास करने का अर्थ उसे ग्रहण कर लेने की सीमा तक विश्वास करना है (यूहना १:१२; कुलु २:६)। ज्ञान या सहमति सच्चा विश्वासनहीं है; सच्चे विश्वास में आत्मसात करना सम्मिलित होता है।
२. विश्वास के कुछ परिणाम
१. हम विश्वास के द्वारा बचाए गए हैं (उत्प १५:६; रोमि ५:१; गल ३:२६)।
२. हम विश्वास के द्वारा पवित्र किए गए हैं (प्रेरि २६:१८)।
३. विश्वास के द्वारा आराम, शान्ति, आश्वासन और आनन्द आता है (यशा २६:३; फिलि ४:६; इब्रा ४:१-३; १ पत १:५)।
4. विश्वास के द्वारा हम परमेश्वर के लिए बड़े-बड़े काम करते हैं (इब्रा ११:३२-४०; मत्ति २१:२१ यूहन्ना १४:१२)।
चर्चा – बौद्धिक तथा हृदय से किए गए विश्वास के वे उदाहरण दीजिए जो आपने देखे हैं।
पुनरुज्जीवन या नया जन्म
ऊपर से जन्म (नया जन्म) लेने के सिवाय मसीही बनने के लिए और कोई दूसरा मार्ग नहीं है।
1. पुनरुज्जीवन (नया जन्म) क्या है?
1. पुनरुज्जीवन बपतिस्मा नहीं है। बपतिस्मा कलीसियाई संस्कार है जो यह दिखाता है कि वह व्यक्ति पहले ही मसीही है।
२. यह धर्म-सुधार नहीं है। धर्म-सुधार कुछ पापों से फिर जाने वाला मानवीय कार्य है, जब कि पुनरुज्जीवन आत्मिक सचेतना (प्राण डालना), क्रान्ति, परमेश्वर का अलौकिक कार्य है।
३. पुनरुज्जीवन आत्मिक सचेतना (प्राण डालना), नया जन्म, नयी सृष्टि है (२ कुरि ५:१७; इफि २:१)।
२. पुनरुज्जीवन (नया जन्म) की आवश्यकता
1. प्रत्येक को नया जन्म लेना अवश्य है इसमें कोई अपवाद नहीं है (यूहन्ना ३:३-७; गल ६:१५)।
२. मनुष्य की पापमय स्थिति इसकी माँग करती है (यूहन्ना ३:६; यिर्म १३:२३; रोमि ७:१८; ८:८)1
३. परमेश्वर की पवित्रता इसकी माँग करती है (इब्रा १२:१४)।
३. पुनरुज्जीवन (नया जन्म) के साधन
१. पुनरुज्जीवन ईश्वरीय कार्य है (यूहन्ना १:१३; तीतुस ३:५; यूहन्ना ३:५)।यह सर्वथा और पूर्ण रीति से परमेश्वर का कार्य है।
२. इसका मानवीय पक्ष भी है, यूहन्ना १:१२ तथा १३ दोनों विचारों ईश्वरीय तथा मानवीय को पुनरुज्जीवन में एक साथ लाते हैं, “जितनों ने उसे ग्रहण किया… वे. परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।”
उपसंहार – मनुष्य, सुसमाचार के संदेश को ग्रहण करने के द्वारा (१ कुरि ४:१५; याकूब १:१८; १ पत १:२३) तथा व्यक्तिगत रूप से यीशु मसीह को ग्रहण करने के द्वारा (यूहन्ना १:१२,१३ तथा गल ३:२६) नया जन्म पाता है।
धर्मी ठहराया जाना
१. इसका अर्थ
यह परमेश्वर के समक्ष मनुष्य के संबंध या स्थिति में परिवर्तन है। नया जन्म का संबंध विश्वासी के स्वभाव में परिवर्तन से है, धर्मी ठहराया जाने का संबंध परमेश्वर के समक्ष व्यक्ति की स्थिति (पद) में होने वाले परिवर्तन से है। यह क्षमा से बढ़कर है, धर्मी ठहराया जाने का अर्थ धर्मी घोषित करना है।
धर्मी ठहराया जाना परमेश्वर का न्यायसंबंधी कार्य है, जिसके द्वारा वे लोग जो मसीह पर विश्वास करते हैं वे उसकी दृष्टि में धर्मी, और दोष तथा पाप से मुक्त घोषित किए जाते हैं।
२. धर्मी ठहराए जाने के दो तत्व है
१. पाप की क्षमा और उसके सारे दोष तथा दण्ड का हटाया जाना (मीका 7:18.19; प्रेरि 13:38; रोमि 8:1,33,34)।
२. मसीह की धार्मिकता का दिया जाना तथा परमेश्वर के अनुग्रह में वापस लाया जाना (२ इति 20:7; याकूब 2:23; रोमि 5:17-21)।
3. धर्मी ठहराए जाने की विधि
१. नकारात्मक रूप सेः व्यवस्था के कामों के द्वारा नहीं (रोमि ३:20,28; गल 2:16 तथा 3:10)।
२. सकारात्मक रूप सेः परमेश्वर के मुफ्त अनुग्रह द्वारा (रोमि 3:24)।
३. यीशु मसीह के लहू के द्वारा धर्मी ठहराए जाने का अनुग्रह (रोमि ३:२४; ५:९; २ कुरि 5:21; इब्रा 9:22)।
४. यीशु मसीह में विश्वास करने के द्वारा धर्मी ठहराए जाने की शर्त (गल 2:16; रोमि ३:26; गल ३:20; प्रेरि 1३:३9)।
चर्चा – धर्मी ठहराया जाना क्षमा से कैसे भिन्न है?
दत्तक ग्रहण (लेपालकपन)
१. वत्तक ग्रहण का अर्थ-
“दतक-ग्रहण” का अर्थ “पुत्र का स्थान देना” है। यह रोमी लोगों के द्वारा उपयोग किया जाने वाला एक वैधानिक शब्द है। इसका अर्थ एक मनुष्य का दूसरे शुष्म के पुत्र को अपना पुत्र बनाने के लिए ले लेना है ताकि उस पुत्र का वही पद और वे सारे लाभ हो जो एक पुत्र को जन्म से प्राप्त होते हैं। गल 4:5; रोमि 8015.२३; 9:4 और इफि 1:5 देखिए।
निर्गमन २:10 तथा इब्रानियों 11:२4 दत्तक ग्रहण के पवित्र शास्त्र संबंधी अर्थ तथा उसके उपयोग के दो अनूठे उदाहरण देते हैं।
२. दत्तक ग्रहण की कुछ आशीचें –
हम परमेश्वर के विशिष्ट प्रेम (यूहन्ना 17:२3) तथा उसके पिता-समान देखभाल के (लूका 12:२7-३३) पात्र हैं।
हमारे पास परिवार का नाम (१ यूहन्ना ३:1: इफि ३:14,15), पारिवारिक समानता (रोमि 8:२9), परिवार का प्रेम (यूहन्ना 1३:३5: 1 यूहन्ना ३:14), एक संतान योग्य (पुत्र-सुलभ) आत्मा (रोमि 8:15; गल 4:6) तथा एक पारिवारिक सेवा (यूहन्ना 14:२३,२4; 15:8) है।
हमें पिता से मिलने वाली ताड़ना (इना १२:५-११), पिता से मिलने वाली शान्ति (यशा ६६:१३; २ कुरि १:४) तथा एक विरासत (1 पत 1:३-5; रोमि 8:१7) प्राप्त होती है।
३. संतान होने का प्रमाण-
वे जो परमेश्वर के परिवार में दत्तक ग्रहण किए गए हैं:
ख वे आत्मा के द्वारा चलाए चलते हैं (रोमि ८:४; गल ५:१८)।
ख उनका परमेश्वर में शीशु-सा सरल भरोसा होता है (गल ४:५,६)।
ख उन्हें परमेश्वर के पास जाने का अधिकार है (इफि ३:१२)।
ख भाइयों के लिए उनमें प्रेम होता है (१ यूहन्ना २:९-११; ५:२)
ख वे आज्ञाकारी होते हैं (१ यूहन्ना ५:१-३)।
चर्चा – परमेश्वर की संतान होने तथा परमेश्वर का सेवक होने में क्या भिन्नताएँ
पवित्रीकरण
पवित्रीकरण का संबंध हमारे चरित्र और व्यवहार से है। धर्मी ठहराया जाना वहकार्य है जो परमेश्वर हमारे लिए करता है, जब कि पवित्रीकरण वह कार्य है जो परमेश्वर हमारे भीतर करता है।
१. पवित्रीकरण का अर्थ
इस परिभाषा में दो विचार हैं-
१. पाप से अलगाव (२ इति २९:५: १५-१८; १ थिस्स ४:३)। पवित्रीकरण का संबंध उन सब बातों से दूर हो जाने से है जो पापमय हैं तथा आत्मा एवं देह को अपवित्र करती हैं।
२. परमेश्वर के प्रति समर्पण (लैव्य २७:१४,१६; गिनती ८:१७; यूहना १०:३६)। जो कुछ मात्र परमेश्वर की सेवा के लिए समर्पित कर दिया गया है वह पवित्र किया गया है।
३. वह परमेश्वर के द्वारा उपयोग में लाया जाता है (यहेज ३६:२३)।
२. पवित्रीकरण का समय –
पवित्रीकरण को तीन रूप में देखा जा सकता है: भूत, वर्तमान तथा भविष्यः या तत्काल होने वाला, क्रमशः होने वाला तथा जो पूर्ण हो चुका है।
मसीह में १. तत्काल होने वाला (१ कुरि ६:११; इन्ना १०:१०,१४) विश्वास करने के एक सरल कार्य के द्वारा विश्वासी तत्काल पवित्रीकरण की अवस्था में रखा जाता है।
२. क्रमशः होने वाला (२ पत ३:१८; २ कुरि ३:१८; १ थिस्स ३:१२) हम चरित्र या महिमा की एक श्रेणी से दूसरी श्रेणी में (अंश-अंश करके) रूपान्तरित होते जा रहे हैं।
३. पूर्ण तथा अन्तिम पवित्रीकरण (१ थिस्स ५:२३; ३:१३)।
३. पवित्रीकरण के साधन
इसके साधन ईश्वरीय तथा मानवीय दोनो हैं: परमेश्वर तथा मानव दोनों इच्छित उद्देश्य की ओर सहयोग देते हैं।
१. ईश्वरीय पक्ष की ओर से यह त्रिएक परमेश्वर का कार्य है:
परमेश्वर पिता (१ थिस्स ५:२३.२४; यूहन्ना १७:१७)।
पुत्र यीशु मसीह (इब्रा १०:१०; इफि ५:२५, २७; १ कुरि १:३०)।
पवित्र आत्मा (१ पत १:२; २ थिस्स २:१३)।
२. मानव पक्ष की ओर सेः
यीशु मसीह के छुटकारे के कार्य में विश्वास (१ कुरि १:३०)। यहाँ पवित्र जीवन का रहस्य मिलता है प्रति क्षण यीशु मसीह को उसके
अनुग्रह के संपूर्ण धन में प्रत्येक आवश्यकता के लिए, जैसे-जैसे वह सामने आती है, आत्मसात करना।
पवित्र शास्त्र का अध्ययन और उसके प्रति आज्ञाकारिता (यूहन्ना १७:१७; इफि ५:२६,२७; यूहन्ना १५:३)।
चर्चा – पवित्रीकरण में समय के तत्वों की चर्चा कीजिए, प्रत्येक अवस्था कब होती है?
प्रार्थना
मसीह जीवन बिना प्रार्थना के बना नहीं रह सकता; यह मसीही जन की जीवनदायक श्वास है।
१. प्रार्थना का महत्व
१. प्रार्थना की उपेक्षा प्रभु के लिए अति दुःखदायी है (यशा ४३:२१,२२; ६४:६,७)।
२. प्रार्थना की कमी से अनेक बुराइयाँ आती हैं (सप १:४-६; दानि ९:१३-१४)।
३. प्रार्थना की उपेक्षा करना पाप है (१ शमू १२:२३)।
४. प्रार्थना में बने रहना एक सकारात्मक आज्ञा है (कुलु ४:२; १ थिस्स ५:१७)।
५. प्रार्थना, परमेश्वर की ओर से हमारे लिए उसके वरदानों को पाने का तरीका है (दानि ९:३; मत्ती ७:१७-११; ९:२४-२९; लूका ११:१३)।
६. प्रेरितों ने प्रार्थना को अपनी सबसे महत्वपूर्ण गतिविधि माना था (प्रेरितों ६:४; रोमि १:९)।
२. प्रार्थना कैसे करें –
प्रार्थना के कम-से-कम ४ भाग होने चाहिए।
