परमेश्वर का अस्तित्व
इस बात के अनेक प्रमाण हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व है। उनमें से कुछ पा हम इस पाठ में ध्यान देंगे:
१. पवित्र शास्त्र से प्रमाणः बाइबल का आरम्भ इस सकारात्मक सत्य से होता है कि परमेश्वर का अस्तित्व है (उत्प १:१) और यह स्पष्ट रीति से बताती है कि मात्र मूर्ख ही उसके अस्तित्व को नकारते हैं (भजन १४:१)।
२. सृष्टि से प्रमाणः आकाश की सुंदरता और महिमा परमेश्वर के अस्तित्व का प्रमाण देती है, (भजन १९:१) और सृष्टि ईश्वरत्व की अनन्त महिमा के बारे में सिखाती है (रोम १:२०)।
३. विवेक से प्रमाणः मनुष्य एक विश्वव्यापी विश्वास के साथ पैदा हुआ है कि एक सर्वोच्च जीव (ईश्वर) का अस्तित्व है।
४. अन्य प्रमाण – परमेश्वर के अस्तित्व के और अनेक प्रमाण हैं, जैसे किः
ख संसार का अस्तित्व है। अवश्य ही किसी व्यक्ति अथवा वस्तु ने इसे अस्तित्व में लाया होगा।
ख इसकी रूपरेखा दर्शाती है कि यह किसी उत्तम योजना बनाने वाले मस्तिष्क का परिणाम है।
ख मनुष्य के पास बौद्धिक और नैतिक स्वभाव है, इससे यह स्पष्ट होता है कि उसका सृष्टिकर्ता अवश्य ही जीवित, बुद्धिमान और नैतिक जीव होगा।
ख जीवन का एक आरम्भ होना चाहिए और यह अवश्य ही अनन्त जीवन रखने वाले जीव से आया होगा।
उपसंहार – इब्रानियों ११:६ पर ध्यान दीजिए – “क्योंकि परमेश्वर के पास आने वाले को विश्वास करना चाहिए कि वह है।” आइए हम बालकों के समान, पवित्र शास्त्र और प्रकृति में उपलब्ध परमेश्वर के प्रकाशन पर आधारित सरल विश्वास के साथ, उस पर सम्पूर्ण विश्वास और भरोसा करते हुए उसके पास आएँ।
परमेश्वर का व्यक्तित्व
परमेश्वर का सच्चा ज्ञान मात्र बाइबल से प्राप्त किया जा सकता है (यूहन्ना १:१८; १ यूहन्ना ४:१२)। आइए हम कुछ सच्चाइयों पर ध्यान दें जो वह हमें उसके (परमेश्वर के) विषय में बताती है: १. उसका व्यक्तित्व – व्यक्तित्व की विशेषता ज्ञान, भावना, तथा इच्छा शक्ति
रखना है। हमारा परमेश्वर एक ऐसा व्यक्ति है जो जीवित है और उसकी निश्चित विशेषताएँ हैं (यिर्म १०:१०; १ धिस्स १:९)।
२. उसका स्वभाव – परमेश्वर आत्मा है। आत्मा की न देह, न हड्डियाँ और न ही रक्त होता है। (यूहन्ना ४:२४)।
३. उसकी एकता – मूर्तिपूजकों के अनेक देवताओं के विपरीत, प्रभु हमारा परमेश्वर यहोवा एक परमेश्वर है (व्यव ६:४; यश ४४:६)।
उपसंहार हम परमेश्वर के विषय में जितना अधिक सीखते हैं, उतना ही अधि क हमें पता चलता है कि हमारा परमेश्वर एक महान परमेश्वर है।
परमेश्वर के स्वाभाविक गुण
क्या ‘गुण’ शब्द कठिन लगता है? इसका सरल अर्थ किसी का स्वभाव अथवा विषेश गुण होता है। इस पाठ में हम परमेश्वर के कुछ गुणों का अध्ययन करेंगे।
१. वह अनन्त है एक सच्चा परमेश्वर होने के लिए उसका न तो आदि और न अन्त होना चाहिए (भजन ९०:२; १ तीमु १:१७)।
२. वह अपरिवर्तनीय है (१ शमु १५:२९; मलाकी ३:६; याकूब १:१७)।
३. वह सर्वशक्तिमान है (अय्यूब ४२:२; यिर्म इसका अर्थ है कि उस के पास सारी सामर्थ है ३२:२७)।
४. वह सर्वव्यापी है उपस्थित है (भजन अर्थात् वह एक ही और समान समय में हर जगह १३९:७-९)।
५. वह सर्वज्ञानी है उसे सम्पूर्ण ज्ञान है (१ इति २८:९; २ इति १६:९; भजन ९४:११; अय्यूब ४२:२; यशा ४०:२८)।
उपसंहार – गरीब, दयनीय मनुष्य के लिए, इस पाठ में हमारे द्वारा पढ़े गए सभी गुणोंवाला परमेश्वर होना आवश्यक है। क्यों मनुष्य के लिए इन में से हर एक आवश्यक है?
परमेश्वर के नैतिक गुण
परमेश्वर के नैतिक गुणों में से हर एक गुण संदेश का विषय बन सकता है। आइए हम उनमें से कुछ पर ध्यान दें –
१. परमेश्वर पवित्र है (निर्ग १५:११: यशा ६:३; १ पत १:१६)।
२. परमेश्वर धर्मी है (भजन ११६:५ एज्रा ९:१५: यिर्म १२:१)।
३. परमेश्वर दयालु है (भजन १०३:८ रोमि ९:१८)।
४. परमेश्वर प्रेमी है (१ यूहवा ४०८-१६ गृहत्रा ३:१६: १६:२७)।
५. परमेश्वर विश्वासयोग्य है. कुरि १०९:२ ती २:१३)।
आने वाले सप्ताहों में अपने परमेश्वर के इन अन्य नैतिक गुणों पर ध्यान दें। वह महिमामय (निर्ग १५:११ भजन १४५:५) अनुग्रहकारी (निर्ग ३४:६ भजन ११६०५): श्रीरजवन्त (गिनती १४:१८: मीका ७:१८); जलन रखने वाला (यहोश २४:१९: नहम १:२) करुणामय (१ राजा ८:२३) महान (२ इति २:५ भजन ८६:१०): अगम (अय्यूब ११:७; भजन १४५:३); अदृश्य (अय्यूब २३:८.९; १ तीमु १:१७); भला (भजन २५:८; ११९:६८); खरा (भजन २५:८; १२:१५); अपरिवर्तनशील (भजन १०२:२६-२७; याकूब १:१७); ज्योति (यशा ६०:१९; १ यूहत्रा १:५); सच्चा (यिर्म १०:१०); सिद्ध (मत्ती ५:४८); अविनाशी (रोमियों १:२३); अमर (१ तीमु १:१७; ६:१६); भस्म करने वाली आग (इना १२:२९) है और उसके तुल्य और कोई नहीं है (निर्ग ९:१४; व्यव ३३:२६)।
उपसंहार – परमेश्वर की पवित्रता ने पाप के लिए दंड की माँग की। ऐसा कैसे हो सकता है कि परमेश्वर एक साथ प्रेमी और पवित्रता की माँग करने वाला भी हो? वह एक दोषी पापी के प्रति एक साथ दयालु और न्यायी कैसे हो सकता है? इसका उत्तर मात्र कलवरी के क्रूस में मिल सकता है, जहाँ यीशु का बलिदान पाप के विरुद्ध परमेश्वर का क्रोध और पापी मनुष्य के प्रति उसकी दया का प्रदर्शन है।
त्रिएकता
परमेश्वर एक है, वह आदिकाल से अस्तित्व में है और हमारे लिए अपने आप को तीन व्यक्तियों में अभिव्यक्त (प्रदर्शित) करता है: पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा।
पवित्र शास्त्र के इन सन्दर्भों पर ध्यान दीजिए जो परमेश्वर की त्रिएकता को प्रमाणित करते हैं:
13 17 १. मत्ती ३:१३ से १७ में यीशु मसीह का बपतिस्मा – पिता स्वर्ग से बोला, पुत्र का बपतिस्मा हुआ और पवित्र आत्मा कबूतर के रूप में नीचे आया और उद्धारकर्त्ता पर उतरा।
२. मत्ती २८:१९ में बपतिस्मा देने की विधि – “पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम में बपतिस्मा देना।”
३. २ कुरिन्थि १३:१४ में आशीष वचन – “प्रभु यीशु ख्रीस्त का अनुग्रह, और परमेश्वर का प्रेम और पवित्र आत्मा की सहभागिता।”
४. उत्पत्ति १:२६ में मनुष्य की सृष्टि के विवरण में परमेश्वर के लिए बहुवचन का प्रयोग किया गया है: “हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएँ।”
उपसंहार – मनुष्य भी त्रिभागी जीव है (अर्थात् उसके तीन भाग हैं) शरीर, आत्मा और प्राण क्योंकि हम परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए हैं।
