1. परिचय
- लेखक: मूसा
- समय: लगभग 1440–1400 ई.पू.
- स्थान: सीनै पर्वत से मोआब की तराई तक।
- नाम का कारण: इसमें दो बार इस्राएल की गिनती (जनगणना) दर्ज है (अध्याय 1 और 26)।
- मुख्य विषय:
- जंगल की यात्रा में आज्ञाकारिता और अवज्ञा के परिणाम।
- विश्वास की कमी का दंड।
- परमेश्वर की विश्वासयोग्यता और मार्गदर्शन।
2. मुख्य विषय
- परमेश्वर का मार्गदर्शन – बादल और आग के स्तंभ से (9:15–23)।
- अनाज्ञाकारिता और शिकायतें – अविश्वास के कारण वाचा भूमि में प्रवेश न कर सके।
- नेतृत्व और याजकाई व्यवस्था – हारून और लेवी का कार्य।
- परमेश्वर की दया और न्याय – दंड भी दिया और पुनः आशा भी दी।
3. संरचना (Outline)
🔹 भाग 1: तैयारी – सीनै पर्वत पर (अध्याय 1–10)
- इस्राएल की गिनती (1–4) – प्रत्येक गोत्र का संगठन।
- याजकों और लेवियों की सेवा (3–4)।
- पवित्रता और व्यवस्था के नियम (5–6)।
- तम्बू की स्थापना और परमेश्वर का बादल (9–10)।
📖 “जिस दिन तम्बू को खड़ा किया गया, उस दिन बादल ने तम्बू को ढक लिया।” (गिनती 9:15)
🔹 भाग 2: जंगल की यात्रा और शिकायतें (अध्याय 11–21)
- लोगों की शिकायतें (11)।
- मिरियम और हारून का मूसा के विरुद्ध बोलना (12)।
- बारह जासूस और कनान की भूमि का अवलोकन (13–14) → लोगों ने विश्वास नहीं किया, दंडस्वरूप 40 वर्ष जंगल में भटकना।
- कोरह का विद्रोह (16)।
- मूसा की छड़ी और पानी निकालने की घटना (20) → मूसा की अवज्ञा।
- कांस्य का सर्प (21:8-9) → यीशु का प्रतीक (यूहन्ना 3:14-15)।
📖 “जैसे मूसा ने जंगल में साँप को ऊँचे पर चढ़ाया, वैसे ही मनुष्य के पुत्र का भी ऊँचे पर चढ़ना आवश्यक है।” (यूहन्ना 3:14)
🔹 भाग 3: बालाक और बिलाम (अध्याय 22–25)
- मोआब का राजा बालाक, बिलाम भविष्यद्वक्ता को बुलाता है।
- बिलाम इस्राएल को शाप देने की जगह आशीष देता है (23–24)।
- इस्राएलियों का मोआबी स्त्रियों के साथ पाप (25)।
🔹 भाग 4: दूसरी पीढ़ी की तैयारी (अध्याय 26–36)
- दूसरी जनगणना (26)।
- यहोशू को मूसा का उत्तराधिकारी ठहराया गया (27)।
- पर्व और बलिदानों का वर्णन (28–29)।
- प्रतिज्ञा और युद्ध (30–31)।
- भूमि का बाँटवारा (32–34)।
- लेवियों के नगर और शरण नगर (35)।
- अन्तिम व्यवस्थाएँ (36)।
4. मुख्य बाइबल पद
- गिनती 6:24–26 – याजकीय आशीष:
“यहोवा तुझे आशीष दे और तेरी रक्षा करे; यहोवा तुझ पर अपना मुख चमकाए और तुझ पर अनुग्रह करे; यहोवा तुझ पर अपना मुख करे और तुझे शांति दे।” - गिनती 9:15–16 – बादल और आग का मार्गदर्शन।
- गिनती 14:22–23 – अविश्वासी पीढ़ी प्रतिज्ञा की भूमि नहीं देखेगी।
- गिनती 21:8–9 – कांस्य का सर्प।
- गिनती 27:18 – यहोशू को अगुवाई सौंपी गई।
5. आध्यात्मिक शिक्षा
- अविश्वास के परिणाम – अविश्वास से प्रतिज्ञा की भूमि नहीं मिली।
- परमेश्वर की विश्वासयोग्यता – अवज्ञा के बावजूद परमेश्वर ने अपनी प्रजा को छोड़ा नहीं।
- नेतृत्व का महत्व – मूसा और यहोशू की नियुक्ति।
- मसीह का संकेत – कांस्य का सर्प यीशु की क्रूस की मृत्यु का प्रतीक।
- पवित्रता और आज्ञाकारिता – परमेश्वर की उपस्थिति पवित्र जीवन की मांग करती है।
6. आज के लिए अनुप्रयोग
- क्या मैं शिकायत और अविश्वास करता हूँ या परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास रखता हूँ?
- क्या मैं अपने जीवन में परमेश्वर के मार्गदर्शन (उसका “बादल”) का अनुसरण करता हूँ?
- क्या मैं पवित्र और विश्वासयोग्य जीवन जी रहा हूँ?
- क्या मैं जानता हूँ कि यीशु ही वह “कांस्य का सर्प” है जो उद्धार लाता है?
