मनुष्य की मूल स्थिति
मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप और समानता में बनाया गया था (उत्प 1:26 तथा 9:6)। स्वरूप का अर्थ किसी आकृति की छाया या रूपरेखा होता है। समानता उस छाया की आकृति के साथ समरूपता होना सूचित करती है।
1. परमेश्वर के स्वरूप का अर्थ शारीरिक समानता को व्यक्त नहीं करता, क्योंकि परमेश्वर आत्मा है।
2. प्रथम मानव बुद्धिमान था। उसने पशुओं के नाम रखे (उत्प २:19,20)। उसमें बोलने, तर्क करने तथा सोचने की सामर्थ थी।
3. उसमें नैतिक तथा आत्मिक प्रतिभाएँ (क्षमताएँ) थीं।
चर्चा – मनुष्यों के लिए पतन के पूर्व का जीवन, आज के जीवन से, किस प्रकार भिन्न था?
मनुष्य का पतन
मनुष्य के पतन का वृत्तान्त मसीही धर्म और अन्य धर्मों के द्वारा भी सिखाया जाता है। उत्पत्ति 3 में मानव इतिहास की इस भयानक दुःखद घटना का पूर्ण विवरण है। यह वृत्तान्त जगत में पाप के प्रवेश के विषय में नहीं बताता, क्योंकि शैतान पहले ही पाप कर चुका था तथा उसे स्वर्ग से निकाल दिया गया था (यहेज 28:1२-15; यशा 14:9-14)। यह वृत्तान्त बताता है कि पाप ने मानवजाति में कैसे प्रवेश किया२. पवित्र आत्मा का अपमान करना (इब्रा १०:२९)।और हमें पापी बना दिया।
1. पतन का कर्ता (कारण) (उत्प ३:1)
1. शैतान स्वयं के नहीं परन्तु एक सुंदर सर्प के रूप में प्रकट हुआ था।
2. उसने तब प्रहार (आक्रमण) किया जब आदम और हव्वा अलग-अलग थे एकता में बल है।
3. उसने उनकी उन प्रवृत्तियों भोजन तथा ज्ञान की अभिलाषा का सहारा लेकर धावा बोला जो यथोचित परन्तु नियंत्रित नहीं थी।
2. कदम जो पतन की ओर ले गए
1. हव्वा उस पेड़ के बहुत पास थी उसे परीक्षा के स्थान से भाग जाना चाहिए था।
2. वह मना की गई वस्तु की प्रशंसा कर रही थी।
3. उसने शैतान से बातचीत की।
4. उसने परमेश्वर के वचन में फेर-बदल किया। उसने “न उसको छूना” जोड़ा, और उसने “बिना खटके” शब्द हटा दिए और उसने “उसी दिन अवश्य मर जाएगा” को “नहीं तो मर जाओगे” में बदलकर परमेश्वर के वचन की तीव्रता (उग्रता) को कम कर दिया।
चर्चा – आज लोगों को परीक्षा में डालने के लिए शैतान की कौन-सी युक्तियाँ हैं? क्या उनमें बहुत कुछ बदलाव हुआ है या वे अधिकतर वैसी ही हैं?
पतन के परिणाम
1. तत्काल हुए परिणाम –
1. वे पापी बन गए उनका आत्मिक जीवन मर गया (इफि २:1)।
2. उनकी आँखे खुल गईं और वे जान गए कि वे नंगे हैं।
3. वे परमेश्वर की उपस्थिति से छिप गए पाप मनुष्य को परमेश्वर से अलग कर देता है।
2. परमेश्वर शाप देता है (उत्प ३:14-19)
1. सर्प को : पृथ्वी के समस्त जानवरों से अधिक शापित ठहराया।
2. स्त्री को : सन्तान उत्पत्ति के समय पीड़ा और दुःख।
3. पुरुष को : भूमि काँटे व ऊँटकटारे उगाने के लिए शापित हुई। उसका जीवन दुःखमय होगा; जीवन यापन करने के लिए पसीना बहाना होगा। मरना होगा और उसी मिट्टी में मिल जाना होगा जिससे वह आया था।
3. अन्तिम परिणामः
1. अब सब मनुष्य परमेश्वर के समक्ष पापी हैं (रोमि 5:12)।
2. सारा संसार दण्ड के अधीन है (रोमि 3:19)।
3. जिन लोगों ने नया जन्म नहीं पाया है वे शैतान की सन्तान माने जाते हैं, परमेश्वर की संतान नहीं (यूहन्ना 8:44)।
4. सम्पूर्ण मानवजाति शैतान की गुलाम बन गई है (2 कुरि 4:4)।
5. मनुष्य का सम्पूर्ण स्वभाव मानसिक रूप से, नैतिक रूप से, आत्मिक रूप से तथा शारीरिक रूप से पाप से प्रभावित हो गया है (इफि 4:18; रोमि 7:18)।
उपसंहार – मनुष्य के पतन के साथ परमेश्वर ने उद्धारकर्त्ता तथा उद्धार की योजना की प्रतिज्ञा की (उत्प 3:15)। परमेश्वर ने इसे लगभग 4000 वर्ष बाद कलवरी पर पूर्ण कर दिया।
