बाइबल स्वर्गदूतों के विषय में क्या कहती है
1. उनका अस्तित्व
1. “स्वर्गदूत” शब्द पहली बार उत्पत्ति 16:7 में आया है, जब यहोवा के दूत ने हाजिरा की सेवा की जब सारा ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया।
2. पुराना नियम में स्वर्गदूतों के लिए और भी अनेक सन्दर्भ हैं (भजन 103:20; 104:4; दानि 10:1२-13 2 शमू 14:20; 24:15,16; 2 राजा 19:35)।
3. यीशु स्वर्गदूतों के अस्तित्व में विश्वास करता था (मत्ती 18:20; मरकुस 13:32; 8:38; मत्ती 13:41 तथा २६:53)।
4. पौलुस तथा अन्य प्रेरित स्वर्गदूतों के अस्तित्व में विश्वास करते थे (२ थिस्स 1:17; कुलु २:18; यूहन्ना 1:51; प्रका 12:7, २२:9; 1 पत ३:२२; २ पत २:11; यहूदा 9)।
२. स्वर्गदूतों का स्वभाव
१. वे सृजे गए हैं; वे मृतकों की आत्माएँ नहीं हैं (कुलु १:१६)।
२. वे आत्माएँ हैं (भजन १०४:४); परन्तु कभी-कभी दृश्य रूप से प्रकट हुए हैं (उत्प १९; न्यायि २:१; ६:११-२२; मत्ती १:२०; यूहन्ना २०:१२)।
३. वे सामर्थी हैं (भजन १०३:२०; २ राजा १९:३५; २ शमू २४:१५,१६)।
4. वे अमर हैं (लूका २०:३५,३६)।
5. वे असंख्य हैं (प्रका ५:११; इब्रा १२:२२; मत्ती २६:५३)।
3. स्वर्गदूतों का पतन
मूल रूप से सारे स्वर्गदूत अच्छे सिरजे गए थे, परन्तु कुछ भ्रष्ट हो गए (२ पत
२:४; यहूदा ६)। हम उनके पतन का कारण नहीं जानते। सम्भवतः वे घमंड और अनाज्ञाकारिता थे. अर्थात वे ही पाप जो शैतान के पतन के कारण थे (यहेज
28॥ अभ्यास-कार्य शैतान के पतन से संबंधित पदों का अध्ययन कीजिए तथा उसके कारणों की चर्चा कीजिए।
स्वर्गदूतों के काम
१. उन पतित दूतों के काम जो अभी स्वतन्त्र हैं
१. वे परमेश्वर के उद्देश्यों का विरोध करते हैं (दानि १०:१०-१४)।
२. वे परमेश्वर के लोगों को दुःख पहुँचाते हैं (लूका १३:१६; मत्ती 17:15-18)।
३. वे शैतान के उद्देश्यों को पूरा करते हैं (मत्ती २5:41; 12:26-२7)।
4. वे परमेश्वर के लोगों के आत्मिक जीवन में बाधा पहुँचाते हैं (इफि 6:1२)।
5. वे परमेश्वर के लोगों को धोखा देने का प्रयास करते हैं (1 शमू २8:7-२०)।
उनके छुटकारे की कोई आशा नहीं है (यहूदा 6; २ पत २:4; मत्ती २5:41)। उनका अन्तिम विनाश अनन्त आग में होगा।
२. स्वर्गदूतों का कार्य
१. स्वर्ग में – प्रभु परमेश्वर की महिमा करना, आराधना करना तथा उसकी सेवा करना (प्रका 5:11-12; 8:३,4)।
२. पृथ्वी पर – परमेश्वर के द्वारा सौंपे गए कार्य करना – जैसे किः हाजिरा को झरना दिखाना; तलवार खींचकर यहोशू के सामने प्रकट होना; पतरस को जंजीरों से मुक्त करना; बन्दीगृह के दरवाजे खोलना; परमेश्वर के लोगों को भोजन खिलाना, उन्हे सामर्थ देना तथा उनकी रक्षा करना, इत्यादि।
३. परमेश्वर का न्याय तथा उसके उद्देश्यों को में लाना (गिनती २२:२२; प्रेरि 1२:२3; मत्ती 13:41)।
4. विश्वासियों की अगुवाई करना (प्रेरि ८:२६)।
5. संतों को सहायता, सुरक्षा और सामर्थ प्रदान करना। उदा.- एलियाह को (१ राजा 19); दानिय्येल को सिंहों की मांद में (दानि ६:२२); यीश को (मत्ती 4:11; लूका २२:43)।
6. जब हमारा प्रभु वापिस आएगा तब उसके साथ स्वर्गदूत भी आएँगे (मत्ती
२5:३1: 1 थिस्स 1:7-8)।
7. वे परमेश्वर की संतानों को मृत्यु के समय स्वर्ग ले जाते हैं (लूका 16:२२)।
चर्चा- क्या आपने अपने जीवन में स्वर्गदूतों की सहायता का अनुभव किया है?
